| धनी वर्ग की जीवन शैली | दीन-दरिद्र वर्ग की जीवन शैली |
|---|---|
| १. रात-दिन मौज-मस्ती, सुख और आनंद ही आनंद। | १. शिशिर ऋतु की कड़कड़ाती ठंड और सारे दुखों को झेलना। |
| २. हलवा-पूड़ी, दूध-मलाई जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों का उपभोग। | २. दो वक्त की सूखी रोटी और साधारण भाजी का भी भारी अभाव। |
| ३. बहुमूल्य गरम ऊनी वस्त्र, दुशाले और हीटर की सुविधा। | ३. फटे-चीथड़े कपड़ों में काँपते हुए रातें बिताना। |
| ४. सुंदर, पक्के और सुरक्षित महलों व हवेलियों में निवास। | ४. टूटी-फूटी झोपड़ियों में बिना छत के असहाय जीवन। |
| क्र. | ऋतु | अंग्रेजी माह | हिंदी (भारतीय) माह |
|---|---|---|---|
| १. | वसंत ऋतु | मार्च – अप्रैल | चैत्र – वैशाख |
| २. | ग्रीष्म ऋतु | मई – जून | ज्येष्ठ – आषाढ़ |
| ३. | वर्षा ऋतु | जुलाई – अगस्त | श्रावण – भाद्रपद |
| ४. | शरद ऋतु | सितंबर – अक्टूबर | आश्विन – कार्तिक |
| ५. | हेमंत ऋतु | नवंबर – दिसंबर | मार्गशीर्ष – पौष |
| ६. | शिशिर ऋतु | जनवरी – फरवरी | माघ – फाल्गुन |
‘विश्वबंधुता’ का अर्थ है संपूर्ण संसार के प्राणियों को अपना भाई-बंधु समझना। हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति ने हमेशा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है) का अमर संदेश दिया है। आज के वैज्ञानिक युग में जब दूरियाँ मिट चुकी हैं और दुनिया एक वैश्विक गाँव (ग्लोबल विलेज) बन चुकी है, तब विश्वबंधुता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
आज विभिन्न राष्ट्रों के बीच युद्ध, आतंकवाद, हथियारों की होड़ और वैचारिक विद्वेष के कारण मानवता संकट में है। यदि तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो आधुनिक परमाणु अस्त्र पूरी पृथ्वी को क्षणभर में राख के ढेर में बदल देंगे। इस विनाशकारी खतरे से बचने का एकमात्र उपाय विश्वबंधुता, प्रेम और परस्पर सह-अस्तित्व है।
जब तक सभी देश संकीर्ण राष्ट्रीय सीमाओं और स्वार्थों से ऊपर उठकर एक-दूसरे के सुख-दुख में हाथ नहीं बँटाएंगे, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं है। सचमुच, समूची मानव जाति के अस्तित्व और कल्याण के लिए विश्वबंधुता आज के युग की सबसे बड़ी और अनिवार्य माँग है।
छायावाद के प्रवर्तक कवियों में अग्रणी मुकुटधर पांडेय द्वारा रचित 'समता की ओर' एक अत्यंत विचारोत्तेजक और प्रगतिशील कविता है। कवि ने शिशिर ऋतु की हाड़ कँपाने वाली ठंड के माध्यम से समाज में व्याप्त घोर आर्थिक विषमता, अमीरों के विलासी जीवन और गरीबों की दयनीय दशा का अत्यंत मार्मिक तुलनात्मक चित्रण किया है। कवि सभी मनुष्यों को एक ही ईश्वर की संतान मानते हुए समाज में समता, बंधुत्व और करुणा की स्थापना का आह्वान करते हैं।
शिशिर ऋतु में कड़ाके की ठंड और पाले के कारण पेड़-पौधों के पत्ते झड़ जाते हैं, प्रकृति का सौंदर्य मुरझा जाता है तथा गरीब और बेसहारा लोग ठंड के मारे थर-थर काँपते हैं।
समाज में अमीरी-गरीबी की खाई को पाटकर सभी मनुष्यों को समान अधिकार, सम्मान और साधन मिलना चाहिए। गरीबों को अपना भाई मानकर उनकी पीड़ा दूर करना ही सच्ची मानवता है।