| बुद्धिजीवी वर्ग | श्रमजीवी वर्ग |
|---|---|
| १. मुख्य रूप से बौद्धिक कार्य या दिमाग से काम करते हैं। | १. मुख्य रूप से शारीरिक श्रम या हाथ-पैर से मेहनत करते हैं। |
| २. अधिक आमदनी, समाज में मान-प्रतिष्ठा और सुखमय जीवन पाते हैं। | २. कम आमदनी, मान-प्रतिष्ठा का अभाव और कष्टमय जीवन जीते हैं। |
| क्र. | शब्द | विलोम शब्द |
|---|---|---|
| १. | हाड़ (हड्डी) | माँस |
| २. | प्रत्यक्ष | अप्रत्यक्ष |
| ३. | देश | विदेश |
| ४. | स्वार्थ | परार्थ |
| ५. | अमीर | गरीब |
| ६. | सुख | कष्ट / दुःख |
| मुहावरा | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| १. गुजर-बसर करना | जीविका चलाना | मोहन अपनी छोटी-सी दुकान से किसी तरह परिवार का गुजर-बसर कर लेता है। |
| २. गला फाड़ना | ऊँची आवाज में चिल्लाना | अध्यापक ने छात्र से कहा, “शांत होकर बात करो, नाहक गला क्यों फाड़ रहे हो?” |
| ३. कलेजे में हूक उठना | मन में तीव्र वेदना या कसक होना | बाढ़ पीड़ितों का दुःख देखकर समाजसेवक के कलेजे में हूक उठने लगी। |
| ४. सीना तानकर खड़े रहना | दृढ़तापूर्वक डटे रहना | हमारे वीर सैनिक सीमा पर हर खतरे के सामने सीना तानकर खड़े रहते हैं। |
| ५. टाँग अड़ाना | व्यर्थ बाधा डालना | दूसरों के भले काम में कभी बेवजह टाँग नहीं अड़ानी चाहिए। |
| ६. जेब ढीली होना | काफी धन खर्च होना | महानगरों के बड़े अस्पतालों में इलाज कराने से अच्छी-खासी जेब ढीली हो जाती है। |
| ७. निजात पाना | मुक्ति या छुटकारा पाना | कड़ी मेहनत के बाद किसान आखिरकार पुराने कर्ज से निजात पा गया। |
| ८. फूट-फूटकर रोना | बिलख-बिलख कर रोना | परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर छात्र माँ की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा। |
| ९. मन तरंगित होना | उत्साह व खुशी में मग्न होना | परीक्षा में प्रथम आने का समाचार सुनते ही रोहन का मन तरंगित हो उठा। |
| १०. मुँह लटकाना | उदास या लज्जित होना | पिताजी की डाँट सुनते ही छोटा भाई चुपचाप मुँह लटकाकर बैठ गया। |
एक सुंदर गाँव में आत्माराम नाम का एक गरीब किंतु अत्यंत परिश्रमी युवक रहता था। उसके पास न तो अपनी जमीन थी और न ही कोई स्थायी काम। वह दूसरों के खेतों में मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से अपने परिवार का पेट पालता था। एक दिन गाँव में एक ज्ञानी साधु पधारे। आत्माराम ने साधु के चरणों में प्रणाम कर अपनी गरीबी दूर करने का उपाय पूछा।
साधु ने पास की मिट्टी उठाकर उसे दी और मुस्कुराते हुए कहा, “वत्स! ईश्वर ने तुम्हें दो हाथ दिए हैं, यह मिट्टी तुम्हारे लिए सोना बन सकती है। इससे खिलौने बनाओ और बाजार में बेचो।” आत्माराम ने साधु की सीख को जीवन का मंत्र बना लिया। वह गीली मिट्टी से सुंदर खरगोश, तोते और तरह-तरह के खिलौने बनाकर मेले में बेचने लगा। उसकी कला की बहुत प्रशंसा होने लगी और उसकी आय बढ़ गई।
एक दिन एक छोटे बालक ने उससे चाँद के आकार का खिलौना माँगा, जो रात में चमक सके और हल्का हो। आत्माराम सोचने लगा कि मिट्टी का चाँद भारी होगा। तभी उसने देखा कि बच्चे रंग-बिरंगे कागज की पतंगें उड़ा रहे हैं। आत्माराम के मन में नया विचार आया। उसने चमकीले और हल्के कागज से सुंदर चाँद, तारे और रंगीन मुखौटे बनाने शुरू कर दिए।
कागज के हल्के खिलौनों की माँग इतनी बढ़ गई कि दूर-दूर के शहरों से व्यापारी उसके खिलौने खरीदने आने लगे। आत्माराम की मेहनत और बुद्धिमत्ता ने उसकी गरीबी को सदा के लिए दूर कर दिया।
गांधीवादी विचारक श्रीकृष्णदास जाजू द्वारा रचित वैचारिक निबंध 'श्रम साधना' में शारीरिक श्रम की महत्ता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता पर बल दिया गया है। लेखक का स्पष्ट मत है कि यदि समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से का शारीरिक श्रम करे, तो गरीबी, असमानता और शोषण का स्वतः अंत हो जाएगा। गांधीजी के स्वावलंबन और 'रोटी के लिए श्रम' (Bread Labor) के सिद्धांत का यह उत्कृष्ट विश्लेषण है।
प्रकृति द्वारा दी गई प्राकृतिक संपदा (भूमि, जल, वनस्पति) और मनुष्य का शारीरिक श्रम—ये दोनों ही संपत्ति निर्माण के मुख्य साधन हैं।
जिस राज्य व्यवस्था में समाज के प्रत्येक नागरिक को भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएँ बिना किसी भेदभाव के प्राप्त हों और जहाँ दुर्बलों का संरक्षण हो, उसे कल्याणकारी राज्य कहते हैं।