| क्र. | वाक्य | अर्थ के आधार पर वाक्य भेद |
|---|---|---|
| १. | क्या पैसा कमाने के लिए गलत रास्ता चुनना उचित है? | प्रश्नवाचक वाक्य |
| २. | इस वर्ष भीषण गरमी पड़ रही थी। | विधानवाचक वाक्य |
| ३. | आप उन गहनों की चिंता न करें। | निषेधवाचक वाक्य |
| ४. | सुनील, जरा ड्राइवर को बुलाओ। | आज्ञावाचक वाक्य |
| ५. | अपने समय के लेखकों में आप किन्हें पसंद करते हैं? | प्रश्नवाचक वाक्य |
| ६. | सैकड़ों मनुष्यों ने भोजन किया। | विधानवाचक वाक्य |
| ७. | हाय! कितनी निर्दयी हूँ मैं। | विस्मयादिबोधक वाक्य |
| ८. | काकी उठो, भोजन कर लो। | आज्ञावाचक वाक्य |
| ९. | वाह! कैसी सुगंध है। | विस्मयादिबोधक वाक्य |
| १०. | तुम्हारी बात मुझे अच्छी नहीं लगी। | निषेधवाचक वाक्य |
| क्र. | वाक्य | रचना के आधार पर भेद |
|---|---|---|
| १. | अधिकारियों के चेहरे पर हलकी-सी मुस्कान और उत्सुकता छा गई। | सरल वाक्य |
| २. | हर ओर से अब वह निराश हो गया था। | सरल वाक्य |
| ३. | उसे देख-देख बड़ा जी करता कि मौका मिलते ही उसे चलाऊँ। | मिश्र वाक्य |
| ४. | वह बूढ़ी काकी पर झपटी और उन्हें दोनों हाथों से झटककर बोली। | संयुक्त वाक्य |
| ५. | मोटे तौर पर दो वर्ग किए जा सकते हैं। | सरल वाक्य |
| ६. | अभी समाज में यह चल रहा है क्योंकि लोग अपनी आजीविका शरीर श्रम से चलाते हैं। | संयुक्त वाक्य |
जल प्रकृति का दिया हुआ वह अनमोल उपहार है, जिसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हवा के बाद प्राणी मात्र के जीवित रहने के लिए सबसे आवश्यक वस्तु पानी ही है। इसीलिए हमारे पूर्वज कह गए हैं कि ‘जल ही जीवन है’।
हमें पीने, भोजन बनाने, खेती-बाड़ी और उद्योगों के लिए जल की आवश्यकता होती है। किंतु आज तेजी से बढ़ती जनसंख्या, अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और वनों की कटाई के कारण पीने योग्य शुद्ध जल का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। भूजल स्तर निरंतर नीचे गिरता जा रहा है और नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। यदि हमने समय रहते पानी की बर्बादी नहीं रोकी, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए गहरा संकट खड़ा हो जाएगा।
हमें वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) अपनाना होगा, नलों को व्यर्थ खुला छोड़ने से बचना होगा और जल स्रोतों को प्रदूषण मुक्त रखना होगा। जल का संरक्षण केवल सरकार का नहीं, अपितु हम सभी का परम कर्तव्य है। सच ही कहा गया है कि यदि आज हम जल बचाएंगे, तभी हमारा कल सुरक्षित रहेगा।
सुप्रसिद्ध लघुकथाकार नरेंद्र छाबड़ा द्वारा रचित 'दो लघुकथाएँ' समाज की दो अलग-अलग विद्रूपताओं और विसंगतियों पर करारा प्रहार करती हैं। पहली लघुकथा 'कंगाल' में मध्यमवर्गीय संकीर्ण मानसिकता पर चोट की गई है, जहाँ लोग महंगे होटलों में अंधाधुंध खर्च करते हैं किंतु गरीब रेहड़ी वालों से दो-चार रुपयों के लिए मोलभाव करते हैं। दूसरी कथा 'सही उत्तर' में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और भाई-भतीजावाद के दौर में एक बेरोजगार युवक की निर्भीकता और सत्यवादिता का प्रेरक चित्रण है।
जो लोग बड़े होटलों और मॉल में शान-शौकत से हजारों रुपये खर्च करते हैं, परंतु गरीब और असहाय फल-सब्जी विक्रेताओं से चंद रुपयों के लिए झगड़ते हैं, लेखक ने उनकी इस संकीर्ण मानसिकता को सच्चा 'कंगाल' कहा है।
युवक ने बिना किसी संकोच के साक्षात्कार बोर्ड के सामने भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के कड़वे सच को निर्भीकता, ईमानदारी और सत्य के साथ रखा। उसके इस नैतिक साहस और सच्चाई से प्रभावित होकर चयनकर्ताओं ने उसका चयन किया।