राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी चाँदनी रात की प्राकृतिक सुंदरता का मनोहारी वर्णन करते हुए कहते हैं कि रात्रि के समय सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और थल में क्रीड़ा करती हुई अत्यंत सुहावनी लग रही हैं। पूरी पृथ्वी और आकाश में निर्मल स्वच्छ चाँदनी चादर की भाँति फैली हुई है। धरती हरी-हरी घास की नोकों के माध्यम से अपनी अपार प्रसन्नता व्यक्त कर रही है। हवा के मंद-मंद झोंकों के प्रभाव से सारे वृक्ष भी मस्ती में झूमते हुए दिखाई दे रहे हैं।
कवि कहते हैं कि पंचवटी में चारों ओर कितनी उज्ज्वल और स्वच्छ चाँदनी फैली हुई है। रात अत्यंत शांत और सन्नाटे से भरी हुई है। सुगंधित और मनभावन वायु अपनी स्वतंत्र चाल से मंद-मंद प्रवाहित हो रही है। इस समय ऐसी कोई दिशा नहीं है जहाँ आनंद का साम्राज्य न हो, अर्थात सभी दिशाएँ आनंदमयी हो उठी हैं। इस नीरव वातावरण में भी नियति रूपी नटी अपने सारे कार्य अत्यंत शांति और अकेलेपन में चुपचाप पूर्ण निष्ठा के साथ संपन्न किए जा रही है।
राधिका : गौरी, आज बाजार में बहुत चहल-पहल है और तुम बहुत सारे फूल-माला खरीद रही हो?
गौरी : हाँ राधिका! आज आश्विन मास की शरद पूर्णिमा है जिसे 'कोजागरी पूर्णिमा' भी कहते हैं।
राधिका : इस त्योहार की क्या मान्यता और परंपरा है?
गौरी : मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होकर अमृत वर्षा करता है। लोग रात को खुले आकाश के नीचे खीर या दूध रखते हैं और माँ लक्ष्मी की आराधना करते हैं ताकि घर में सुख, शांति और स्वास्थ्य का वास हो।
राधिका : सचमुच! यह त्योहार प्राकृतिक सौंदर्य और भक्ति का अद्भुत संगम है।
| प्रश्न / विधान | उत्तर |
|---|---|
| १. घास की नोकों से खुशी प्रकट करने वाली | पृथ्वी (धरती) |
| २. वायु के झोंकों से मस्ती में झूमने वाले | वृक्ष (तरु) |
| ३. सबके सो जाने पर ओस रूपी मोती बिखेरने वाली | वसुंधरा |
| ४. सुबह होने पर मोतियों को बटोर लेने वाला | सूर्य (रवि) |
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रसिद्ध खंडकाव्य 'पंचवटी' से संकलित 'चाँदनी रात' एक अप्रतिम प्रकृति-गीत है। इसमें कवि ने पंचवटी में चाँदनी रात के अलौकिक सौंदर्य, चंचल किरणों की जल-थल में क्रीड़ा, स्वच्छ वातावरण और नियति के शांत कार्य-व्यापार का सजीव और काव्यात्मक चित्रण किया है।
इस कविता के रचयिता राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हैं और यह उनके प्रसिद्ध खंडकाव्य 'पंचवटी' का एक अंश है।
कविता में रात्रि के समय घास और पत्तों पर बिखरी ओस की बूँदों को मोती कहा गया है, जिन्हें सुबह होने पर सूर्य अपनी किरणों से बटोर लेता है।
पंचवटी में पर्णकुटीर के सामने एक स्वच्छ शिला पर धनुर्धर वीर लक्ष्मण जी एकाग्रचित्त होकर पहरा दे रहे हैं।