पहली इकाई | पाठ १ : चाँदनी रात

कविता - मैथिलीशरण गुप्त (स्वाध्याय प्रश्न उत्तर)

Q1) सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए: (क) संजाल पूर्ण कीजिए:
संजाल प्रश्न: तारों के उदित और अस्त होने के बारे में कवि की कल्पना:
उत्तर :
१. संध्या सुंदरी का दीप्त होना
२. पृथ्वी द्वारा ओस रूपी मोती फैलाना
↑ ↑
तारों के उदित और अस्त होने के बारे में कल्पना
↓ ↓
३. सूर्य द्वारा मोतियों को बटोर लेना
४. सूर्य द्वारा विश्रामदायिनी संध्या दे जाना
Q2) लिखिए: (ख) चाँदनी रात की विशेषताएँ:
उत्तर :
१ सुंदर चंद्रमा की झिलमिलाती किरणें जल और थल में फैली हुई हैं।
२ संपूर्ण पृथ्वी और आकाश में निर्मल, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है।
३ हरी-हरी घास की नोकों के माध्यम से पृथ्वी अपनी खुशी प्रकट कर रही है।
४ सभी वृक्ष मंद-मंद वायु के झोंकों से झूमते प्रतीत होते हैं।
५ दूर-दूर तक फैली स्वच्छ चाँदनी बहुत ही साफ दिखाई दे रही है।
६ रात सन्नाटे और नीरवता से भरी है, कहीं कोई शोर नहीं हो रहा है।
७ वायु स्वच्छंद और निर्मल होकर अपनी स्वतंत्र गति से मंद-मंद बह रही है।
८ इस शांत और पावन समय में चारों दिशाओं में आनंद ही आनंद व्याप्त है।
Q3) निम्नलिखित पंक्तियों का सरल अर्थ / भावार्थ लिखिए:
१. "चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल-थल में... मंद पवन के झोंकों से।"
भावार्थ :

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी चाँदनी रात की प्राकृतिक सुंदरता का मनोहारी वर्णन करते हुए कहते हैं कि रात्रि के समय सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और थल में क्रीड़ा करती हुई अत्यंत सुहावनी लग रही हैं। पूरी पृथ्वी और आकाश में निर्मल स्वच्छ चाँदनी चादर की भाँति फैली हुई है। धरती हरी-हरी घास की नोकों के माध्यम से अपनी अपार प्रसन्नता व्यक्त कर रही है। हवा के मंद-मंद झोंकों के प्रभाव से सारे वृक्ष भी मस्ती में झूमते हुए दिखाई दे रहे हैं।

२. "क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा... शांत और चुपचाप।"
भावार्थ :

कवि कहते हैं कि पंचवटी में चारों ओर कितनी उज्ज्वल और स्वच्छ चाँदनी फैली हुई है। रात अत्यंत शांत और सन्नाटे से भरी हुई है। सुगंधित और मनभावन वायु अपनी स्वतंत्र चाल से मंद-मंद प्रवाहित हो रही है। इस समय ऐसी कोई दिशा नहीं है जहाँ आनंद का साम्राज्य न हो, अर्थात सभी दिशाएँ आनंदमयी हो उठी हैं। इस नीरव वातावरण में भी नियति रूपी नटी अपने सारे कार्य अत्यंत शांति और अकेलेपन में चुपचाप पूर्ण निष्ठा के साथ संपन्न किए जा रही है।

Q4) भाषा बिंदु: निम्न शब्दों के तीन-तीन पर्यायवाची (समानार्थी) शब्द लिखिए:
उत्तर :
तरु
➔
वृक्ष
पेड़
विटप
वसुंधरा
➔
पृथ्वी
भूमि
धरती
चंद्र
➔
चंद्रमा
चाँद
शशि
कृषक
➔
किसान
हलधर
अन्नदाता
उद्यान
➔
वाटिका
उपवन
बगीचा
अरण्य
➔
वन
जंगल
कानन
Q5) संभाषणीय एवं आकलन कृतियाँ:
१. संभाषणीय: 'शरद पूर्णिमा' त्योहार के संदर्भ में दो सहेलियों के बीच संवाद:
उत्तर :

राधिका : गौरी, आज बाजार में बहुत चहल-पहल है और तुम बहुत सारे फूल-माला खरीद रही हो?

गौरी : हाँ राधिका! आज आश्विन मास की शरद पूर्णिमा है जिसे 'कोजागरी पूर्णिमा' भी कहते हैं।

राधिका : इस त्योहार की क्या मान्यता और परंपरा है?

गौरी : मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होकर अमृत वर्षा करता है। लोग रात को खुले आकाश के नीचे खीर या दूध रखते हैं और माँ लक्ष्मी की आराधना करते हैं ताकि घर में सुख, शांति और स्वास्थ्य का वास हो।

राधिका : सचमुच! यह त्योहार प्राकृतिक सौंदर्य और भक्ति का अद्भुत संगम है।

२. एक-एक शब्द में उत्तर लिखिए:
उत्तर :
प्रश्न / विधान उत्तर
१. घास की नोकों से खुशी प्रकट करने वाली पृथ्वी (धरती)
२. वायु के झोंकों से मस्ती में झूमने वाले वृक्ष (तरु)
३. सबके सो जाने पर ओस रूपी मोती बिखेरने वाली वसुंधरा
४. सुबह होने पर मोतियों को बटोर लेने वाला सूर्य (रवि)
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पाठ परिचय : चाँदनी रात (मैथिलीशरण गुप्त)

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रसिद्ध खंडकाव्य 'पंचवटी' से संकलित 'चाँदनी रात' एक अप्रतिम प्रकृति-गीत है। इसमें कवि ने पंचवटी में चाँदनी रात के अलौकिक सौंदर्य, चंचल किरणों की जल-थल में क्रीड़ा, स्वच्छ वातावरण और नियति के शांत कार्य-व्यापार का सजीव और काव्यात्मक चित्रण किया है।

कविता के प्रमुख जीवन-मूल्य एवं संकल्पनाएँ

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. 'चाँदनी रात' कविता के रचयिता कौन हैं और यह किस काव्य से ली गई है?

इस कविता के रचयिता राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हैं और यह उनके प्रसिद्ध खंडकाव्य 'पंचवटी' का एक अंश है।

२. कविता में 'मोती' किसे कहा गया है और उन्हें कौन बटोरता है?

कविता में रात्रि के समय घास और पत्तों पर बिखरी ओस की बूँदों को मोती कहा गया है, जिन्हें सुबह होने पर सूर्य अपनी किरणों से बटोर लेता है।

३. पंचवटी में कुटीर के सामने शिला पर कौन पहरा दे रहा है?

पंचवटी में पर्णकुटीर के सामने एक स्वच्छ शिला पर धनुर्धर वीर लक्ष्मण जी एकाग्रचित्त होकर पहरा दे रहे हैं।

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