कृषक कमजोर शरीर को पत्तियों से पालता है।
कृषक बंजर जमीन को अपने खून-पसीने से सींचकर उर्वरा (उपजाऊ) बना देता है।
| काव्य पंक्ति | जागृत होने वाला भाव |
|---|---|
| 1. आज उसपर मान कर लूँ | अभिमान (गर्व का भाव) |
| 2. आह्वान उसका आज कर लूँ | मानवता एवं सम्मान का भाव |
| 3. नव सृष्टि का निर्माण कर लूँ | सृजनशीलता का भाव |
| 4. आज उसका ध्यान कर लूँ | आदर, कृतज्ञता एवं श्रद्धा का भाव |
| मुद्दे | विश्लेषण |
|---|---|
| 1. रचनाकार का नाम | दिनेश भारद्वाज |
| 2. रचना की विधा | कविता (गीत) |
| 3. पसंद की पंक्तियाँ | "हाथ में निज हाथ धरकर, आज उसका ध्यान कर लूँ। उस कृषक का गान कर लूँ॥" |
| 4. पसंद होने का कारण | इन पंक्तियों में अन्नदाता किसान के प्रति कवि की गहरी संवेदना, श्रद्धा और कृतज्ञता का सुंदर प्रकटीकरण हुआ है, जो हमें किसान के त्याग का स्मरण कराता है। |
| 5. रचना से प्राप्त संदेश | किसान हमारे देश का अन्नदाता और भाग्य-विधाता है। हमें उसके श्रम का सम्मान करना चाहिए और उसके जीवन को खुशहाल बनाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। |
कवि दिनेश भारद्वाज द्वारा रचित 'कृषक गान' देश के अन्नदाता किसान की अनथक मेहनत, त्याग और समर्पण को समर्पित एक अत्यंत भावपूर्ण कविता है। कवि ने स्पष्ट किया है कि चिलचिलाती धूप, कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश में भी किसान संपूर्ण संसार का भरण-पोषण करने के लिए दिन-रात खेतों में पसीना बहाता है। कवि ऐसे सृजनशील अन्नदाता पर गर्व करते हुए उसका गान गाना चाहते हैं।
क्योंकि किसान अभावों में रहकर भी सारे संसार को अन्न देकर पालता है और बंजर धरती को भी अपनी मेहनत से उपजाऊ बना देता है।
कविता में किसान को 'सृजक' (निर्माता), 'अन्नदाता' और 'त्याग की मूर्ति' कहा गया है।