दूसरी इकाई | पाठ १ : बरषहिं जलद

महाकाव्य (रामचरितमानस - किष्किंधाकांड) - संत तुलसीदास (स्वाध्याय प्रश्न उत्तर)

Q1) कृति पूर्ण कीजिए :
पद्यांश में आए प्राकृतिक जल स्रोत :
पद्यांश में आए प्राकृतिक जल स्रोत
१. नदी
२. समुद्र
Q2) निम्न अर्थ को स्पष्ट करने वाली पंक्तियाँ पद्यांश से ढूँढ़कर लिखिए :
1. संतों की सहनशीलता :
उत्तर : ‘खल के बचन संत सह जैसे।’
2. कपूत के कारण कुल की हानि :
उत्तर : ‘जिमि कपूत के उपजे, कुल सदधर्म नसाहिं।।’
Q3) तालिका पूर्ण कीजिए :
इन्हें यह कहा गया है / तुलना की गई है
(१) नदी के जल का समुद्र में मिलना ईश्वर को प्राप्त कर स्थिर हुआ जीव
(२) सज्जनों के सद्गुण तालाब में जल भरना
Q4) उचित जोड़ियाँ मिलाइए :
स्तंभ 'अ' (प्राकृतिक दृश्य / ध्वनि) स्तंभ 'आ' (प्रतीकात्मक अर्थ / साम्य)
१. नव पल्लव से भरा वृक्ष साधक के मन का विवेक
२. उपकारी की संपत्ति ससि संपन्न पृथ्वी
३. मेढक की ध्वनि बटुक समुदाय द्वारा वेद-पाठ
४. कलियुग में धर्म का पलायन होना चक्रवाक पक्षी का न दिखना
Q5) इनके लिए पद्यांश में प्रयुक्त शब्द लिखिए :
आधुनिक शब्द पद्यांश में प्रयुक्त शब्द
१. बादल जलद
२. मटमैला पानी ढाबर
३. विद्वान / ज्ञानी बुध
४. भयानक / डरावना घोरा
Q6) प्रस्तुत पद्यांश से अपनी पसंद की किन्हीं चार पंक्तियों का सरल अर्थ लिखिए :
पसंदीदा पंक्तियाँ :
‘भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।’
सरल भावार्थ :
भावार्थ : गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि आकाश से गिरने वाला वर्षा का शुद्ध जल जैसे ही धरती पर गिरता है, वह मिट्टी के संपर्क में आकर मटमैला (गंदा) हो जाता है। ठीक उसी प्रकार संसार में जन्म लेते ही पवित्र जीवात्मा सांसारिक माया-मोह और वासनाओं में लिपटकर मलिन हो जाती है।

आगे कवि कहते हैं कि वर्षा का जल बूँद-बूँद होकर एकत्रित होता है और तालाब भर जाता है। यह दृश्य वैसा ही प्रतीत होता है जैसे धीरे-धीरे सद्गुण एक-एक कर सज्जन पुरुषों के पास अपने आप चले आते हैं। इन पंक्तियों में जीवन का गूढ़ सत्य अत्यंत सरल भाषा में समझाया गया है।
Q7) उपयोजित लेखन : कहानी लेखन
‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ (परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं) इस सुवचन पर आधारित कहानी लेखन कीजिए :
कहानी का शीर्षक : सच्चा धर्म - परोपकार

एक गाँव में सोहन नाम का एक दयालु और मेहनती किसान रहता था। उसके पास थोड़ी-सी जमीन थी, जिसमें वह पूरे साल पसीना बहाकर खेती करता और अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। सोहन के मन में हमेशा दूसरों की भलाई करने की प्रबल भावना रहती थी। गाँव में किसी पर भी कोई विपत्ति आती, सोहन सबसे आगे बढ़कर उसकी सहायता करता था।

एक बार उस क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा। बारिश न होने से किसानों के खेत सूख गए और चारों ओर अन्न-जल की भयंकर कमी हो गई। सोहन के पास पिछले वर्ष का थोड़ा-सा अनाज जमा था। एक दिन दोपहर के समय एक बूढ़ा दुर्बल भिखारी उसके दरवाजे पर आया और काँपते स्वर में बोला, “बेटा! तीन दिनों से कुछ नहीं खाया है, भूख से मेरे प्राण निकल रहे हैं, कुछ भोजन दे दो।”

सोहन की पत्नी ने कहा कि घर में केवल आज का ही भोजन बचा है, यदि यह दे देंगे तो हमारे बच्चे क्या खाएंगे? सोहन ने अत्यंत विनम्रता से समझाया, “ईश्वर हमें कल कोई-न-कोई राह जरूर दिखाएगा, परंतु इस असहाय भूखे व्यक्ति को इस समय अन्न देना हमारा पहला कर्तव्य है।” सोहन ने अपनी थाली का सारा भोजन उस वृद्ध को खिला दिया। तृप्त होकर वृद्ध ने हृदय से उसे ढेर सारे आशीर्वाद दिए।

संयोग से उसी शाम गाँव में सरकार की ओर से राहत सामग्री का ट्रक पहुँच गया और सभी जरूरतमंदों को मुफ्त अनाज मिला। कुछ ही दिनों बाद मूसलाधार बारिश हुई और सोहन के खेत लहलहा उठे। सोहन का विश्वास और मजबूत हो गया कि भलाई कभी व्यर्थ नहीं जाती।

सीख : दूसरों की सहायता और परोपकार करना ही संसार का सबसे बड़ा पुण्य और सच्चा धर्म है।
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पाठ परिचय : बरषहिं जलद (गोस्वामी तुलसीदास)

प्रस्तुत काव्यांश में भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने अमर महाकाव्य 'रामचरितमानस' के किष्किंधाकांड से वर्षा ऋतु का अत्यंत मनोहारी और सजीव वर्णन किया है। कवि ने वर्षा ऋतु के विभिन्न प्राकृतिक दृश्यों के माध्यम से मानव जीवन, सज्जन-दुर्जन के स्वभाव, ज्ञान और भक्ति के गहरे नैतिक सिद्धांतों को सरल दृष्टांतों द्वारा प्रस्तुत किया है।

महत्वपूर्ण बिंदु एवं संकल्पनाएँ

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. 'बरषहिं जलद' काव्य के रचयिता कौन हैं?

बरषहिं जलद काव्यांश के रचनाकार भक्तिकाल के महान संत कवि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं। यह अंश उनके विश्वप्रसिद्ध महाकाव्य 'रामचरितमानस' के किष्किंधाकांड से लिया गया है।

२. बादलों के पृथ्वी के निकट आने की तुलना किससे की गई है?

जिस प्रकार कोई व्यक्ति विद्या प्राप्त करने के बाद विनम्र और शीलवान होकर झुक जाता है, ठीक उसी प्रकार जल से भरे भारी मेघ पृथ्वी के निकट झुककर बरसते हैं।

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