कवि कहते हैं कि हमें बाहरी रूप-रंग और चमक-दमक की प्रशंसा या वाहवाही की लालसा त्याग देनी चाहिए। जैसे भवन के खड़े रहने में नींव की छिपी हुई ईंटों का सबसे बड़ा योगदान होता है, उसी प्रकार हमें समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए चुपचाप दृढ़तापूर्वक उपयोगी व ठोस कार्य करना चाहिए।
मनुष्य का व्यक्तित्व आईने के समान स्वच्छ, निष्कलंक और पारदर्शी होना चाहिए। जीवन में कितनी भी प्रतिकूल या विकट परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, हमें बिना टूटे और बिना विचलित हुए साहसपूर्वक उनका सामना करना चाहिए और अपने मानवीय मूल्यों पर अडिग रहना चाहिए।
| उत्तर शब्द | तैयार किया गया प्रश्न |
|---|---|
| 1. भीड़ | कवि अपने लिए हर चेहरे को कहाँ देखना चाहता है? |
| 2. जुगनू | घोर निराशा और धुंध के समय प्रकाश की नन्हीं किरण बनकर कौन साथ देता है? |
| 3. तितली | कवि किसके टूटे हुए रंगीन परों के स्थान पर दिखने के लिए कहता है? |
| 4. आसमान | हौसले की गर्द बनकर मनुष्य को कहाँ अपनी विजय-गाथा लिखनी चाहिए? |
सहानुभूति एवं परदुखकातरता: सच्चा मनुष्य वही है जो केवल दूसरों के दुख को बाहर से न देखे, अपितु स्वयं उस पीड़ा और वेदना को अपने अंतःकरण में महसूस करे। दूसरों के आंसुओं को पोंछना और उनके कष्टों में सहायक बनना ही जीवन का सर्वोच्च धर्म है।
ईश्वर की सर्वव्यापकता एवं मानवता: कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि संसार की अपार भीड़ में मुझे प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का पावन रूप और सत्यता दिखाई दे। सभी मानव समान हैं और प्रत्येक जीव में परमात्मा का वास है।
कल्पना कीजिए कि यदि मेरा घर इस धरती से दूर नीले अनंत अंतरिक्ष में किसी सुंदर उपग्रह पर होता, तो जीवन कितना अद्भुत और रोमांचक होता! मैं अपनी खिड़की खोलते ही पृथ्वी को एक चमकदार नीले गोले की तरह घूमते देखता और चाँद-सितारे मेरे पड़ोसी होते।
अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण न होने के कारण मैं हवा में तैरते हुए पढ़ाई करता और खाना खाता। वहाँ न धरती का प्रदूषण होता, न गाड़ियों का धुआँ और न ही कोई कोलाहल। चारों ओर केवल असीम शांति और दिव्य प्रकाश का साम्राज्य होता। मैं स्पेस-सूट पहनकर अंतरिक्ष में चहलकदमी (स्पेस वॉक) करता और सौरमंडल के अद्भुत रहस्यों को प्रत्यक्ष देखता।
यद्यपि अंतरिक्ष का घर स्वप्निल लगता, परंतु अपनी हरी-भरी धरती और प्रियजनों की याद मुझे सदा आती। अतः अंतरिक्ष में घर होने के साथ-साथ अपनी पृथ्वी की रक्षा करना भी मेरा संकल्प होता।
सुप्रसिद्ध गजलकार मानिक वर्मा द्वारा रचित 'गजल' एक अत्यंत प्रेरणादायी और विचारोत्तेजक रचना है। गजलकार ने शेरों के माध्यम से मानव को केवल बाहरी सुंदरता और दिखावे का त्याग करके आंतरिक गुणों, कर्मठता, परोपकार और प्रतिकूल परिस्थितियों में अडिग रहने का शाश्वत संदेश दिया है।
क्योंकि समाज और देश की मजबूती के लिए दिखावे और प्रशंसा की चाह छोड़कर चुपचाप ठोस व निःस्वार्थ कार्य करना सबसे महत्वपूर्ण होता है।
इस गजल के रचनाकार सुप्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि एवं गजलकार मानिक वर्मा हैं।