| वाक्य | दिए गए विकल्प | सही शब्द |
|---|---|---|
| १. आर्यभट्ट ने शून्य की _______ की। | (खोज, अनुसंधान, आविष्कार) | खोज |
| २. प्रगति के लिए आपसी _______ आवश्यक है। | (ईर्ष्या, भागदौड़, स्पर्धा) | स्पर्धा |
| ३. कार्यक्रम शुरू करने के लिए अध्यक्ष जी की _______ चाहिए। | (अनुमति, आज्ञा, आदेश) | अनुमति |
| ४. घने बादलों को देखकर बारिश की _______ है। | (आशंका, संभावना, अवसर) | संभावना |
| ५. सड़क-योजना में सैकड़ों मजदूरों को _______ मिला। | (निर्माण, निर्मिति, रोजगार) | रोजगार |
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रकवि अटल बिहारी वाजपेयी जी इस प्रेरक कविता में कहते हैं कि वर्तमान युग ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और भौतिक निर्माणों का अत्यंत पावन और स्वर्णिम युग है। हम नए-नए कारखाने, पुल, उपग्रह और साधन बना रहे हैं; किंतु इस भौतिक विकास की चमक-दमक में हमें मनुष्य के चरित्र निर्माण को कदापि नहीं भूलना चाहिए।
यदि मनुष्य का चरित्र ही गिर गया, तो सारे भौतिक साधन व्यर्थ साबित होंगे। आज समाज में अपने निजी स्वार्थ की जो आँधी चल रही है, उसमें हमें संपूर्ण पृथ्वी और प्राणी-जगत के कल्याण की भावना को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए। भौतिक उन्नति तभी सार्थक है जब उसके साथ नैतिक मूल्यों और मानवता का उत्थान भी जुड़ा हो।
"जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥" देशहित केवल सीमा पर बंदूक लेकर खड़े होने से ही सिद्ध नहीं होता, बल्कि एक सजग नागरिक और विद्यार्थी के रूप में भी हम देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं।
देशहित के लिए मेरा प्रथम दायित्व है कि मैं निष्ठापूर्वक विद्याध्ययन करूँ, अपने चरित्र को उज्ज्वल बनाऊँ और समाज में स्वच्छता व पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करूँ। पानी और बिजली की बचत करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, नियमों का पालन करना और जाति-धर्म के भेदभाव को मिटाकर भाईचारा स्थापित करना ही सच्ची देशभक्ति है। मैं एक आदर्श नागरिक बनकर अपने भारत को विश्व में अग्रणी राष्ट्र बनाने के लिए सदैव तत्पर रहूँगा।
भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा रचित 'निर्माणों के पावन युग में' एक अत्यंत ओजस्वी, युगीन और प्रेरणादायी राष्ट्रीय कविता है। कवि ने इसमें विज्ञान, तकनीक और औद्योगिक विकास के साथ-साथ मानवीय संवेदनशीलता, चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्यों और विश्व-कल्याण के समन्वय पर बल दिया है। विज्ञान तभी कल्याणकारी है जब वह मानवता की सेवा करे।
क्योंकि इस युग में विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में नित्य नए-नए निर्माण और अभूतपूर्व उपलब्धियाँ हासिल हो रही हैं।
आविष्कारों में मनुष्य का सच्चा प्यार और विज्ञान की प्रत्येक खोज में समस्त जीव-जगत के उपकार की भावना होना अनिवार्य है।
कवि 'स्वार्थ साधना की आँधी' से बचने की चेतावनी देते हैं, जिसमें मनुष्य केवल अपने व्यक्तिगत लाभ में लगकर समाज और वसुधा के कल्याण को भूल जाता है।