| मुद्दा | कौआ (काग) | कोयल (कोकिल) |
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| समानता | शरीर का रंग काला होता है। | शरीर का रंग काला होता है। |
| वाणी (स्वर) | कर्कश और कटु बोली बोलता है। | अत्यंत मीठी और कर्णप्रिय बोली बोलती है। |
| सामाजिक सम्मान | कर्कश वाणी के कारण अपवित्र मानकर भगा दिया जाता है। | मधुर वाणी के कारण सभी लोग उसका आदर और सम्मान करते हैं। |
मनुष्य अत्यधिक दीन-हीन बनकर अत्यंत मीठी, विनीत और नम्र वाणी का प्रयोग करता है।
मनुष्य कठोरता और कड़वे वचनों पर उतर आता है, आँखें तरेरता है और मुँह मोड़ लेता है।
| तत्सम शब्द (संस्कृत रूप) | तद्भव शब्द (परिवर्तित रूप) | देशज शब्द (स्थानिक बोली) |
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| शब्द | गाहक (ग्राहक से) | लाठी |
| सहस्र | काग (काक से) | डोलै (डोलना) |
| गुण | कोकिला (कोयल) | फटकै (झाड़ना) |
| हृदय (हिय) | हाथ (हस्त से) | सयानो |
"विद्वान सर्वत्र पूज्यते" अर्थात् गुणी और विद्वान व्यक्ति की पूजा और सम्मान सर्वत्र होता है। कवि गिरधर कहते हैं कि संसार में गुणों के हजारों कद्रदान (गाहक) होते हैं, किंतु गुणहीन व्यक्ति की कोई पूछ नहीं होती। जिस प्रकार कौआ और कोयल दोनों ही काले रंग के होते हैं, परंतु अपनी मधुर वाणी के गुण के कारण कोयल को सब सिर-आँखों पर बिठाते हैं और कौवे को कोई पास फटकने नहीं देता।
मनुष्य की सच्ची पहचान उसके रूप, रंग, धन अथवा जाति से नहीं, बल्कि उसके सद्गुणों, ज्ञान, विनम्रता और चरित्र से होती है। गुणी व्यक्ति समाज का मार्गदर्शन करता है और दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाता है। अतः हमें केवल बाह्य आडंबरों में समय व्यर्थ न गँवाकर अपने भीतर सद्गुणों का विकास करना चाहिए।
रीतिकाल के नीति-काव्य के मूर्धन्य कवि गिरधर द्वारा रचित 'कुंडलियाँ' नीति, व्यवहार और लोक-अनुभव का अद्भुत भंडार हैं। गिरधर कविराय ने सीधी-सादी और सरल लोकभाषा में मनुष्य को व्यावहारिक जीवन के अनमोल सूत्र दिए हैं—जैसे विपत्ति में लाठी का सहारा, गुणी व्यक्ति का आदर, स्वार्थी मित्रों की पहचान, परोपकार और ऋण के व्यवहार में ईमानदारी।
कुंडलिया छंद दोहा और रोला के मेल से बनता है। जिस शब्द से कुंडलिया प्रारंभ होती है, उसी शब्द पर समाप्त होती है और तीसरे चरण में दोहे का अंतिम चरण दोहराया जाता है।
लाठी गहरे पानी और गड्ढों में थाह लेने, नदी पार करने, झाड़ियों व काँटों से बचने और अचानक कुत्ते या शत्रु के आक्रमण पर आत्मरक्षा करने में बहुत उपयोगी सिद्ध होती है।
जिस प्रकार नाव में पानी भरने पर उसे दोनों हाथों से बाहर फेंकना पड़ता है ताकि नाव डूबने से बच सके, उसी प्रकार घर में धन-संपत्ति बढ़ने पर दोनों हाथों से दान करना चाहिए ताकि लोभ और पतन से बचा जा सके।