कबीर के मतानुसार प्रेम किसी खेत में नहीं उपजता।
कबीर जिज्ञासु थे सत्य के।
| वाक्य में प्रयुक्त शब्द | उपसर्ग | मूल शब्द | प्रत्यय |
|---|---|---|---|
| १. फक्कड़ाना लापरवाही और निर्मम... | ला | परवाह | ई |
| २. लोग उनकी असफलता पर क्या... | अ | सफल | ता |
| ३. राजेश अभिमानी लड़का है। | अभि | मान | ई |
| ४. मोह-ममता उन्हें विचलित नहीं कर सकती थी। | वि | चल | इत |
| ५. केवल एक ही प्रतिद्वंद्वी जानता है। | प्रति | द्वंद्व | ई |
| ६. पूर्णिमा के दिन चाँद परिपूर्णता लिए था। | परि | पूर्ण | ता |
संत कबीरदास जी भक्तिकाल के एक ऐसे अद्वितीय संत थे, जिन्होंने केवल ईश्वर-भक्ति का उपदेश ही नहीं दिया, बल्कि तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों, पाखंडों और अंधविश्वासों पर कठोर प्रहार भी किया। उनका मानना था कि बाह्य आडंबरों जैसे तिलक लगाना, माला जपना या दिखावा करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि अंतर्मन की पवित्रता और प्रेम ही सच्ची साधना है।
कबीर जी ने जाति-पाँति, छुआछूत और ऊँच-नीच के भेदभाव का खुलकर विरोध किया और हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया। उन्होंने निर्भीक होकर स्पष्ट शब्दों में कहा कि सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं। उनका 'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ...' वाला संदेश समाज में मानवता और प्रेम की स्थापना करता है। इसलिए कबीर केवल एक भक्त संत ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के एक क्रांतिकारी युगप्रवर्तक समाज सुधारक थे।
मूर्धन्य आलोचक और निबंधकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित 'कबीर' पाठ में संत कबीर के अद्वितीय फक्कड़ व्यक्तित्व, उनकी मस्ती, स्पष्टवादिता और सामाजिक क्रांति का सजीव विश्लेषण किया गया है। लेखक ने बताया है कि कबीर सिर से पैर तक मस्तमौला, स्वभाव से फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह और भेषधारी के सामने प्रचंड थे।
कबीर पुराने कृत्यों का हिसाब नहीं रखते थे, वर्तमान को ही सब कुछ नहीं मानते थे और दुनिया के मान-अपमान की परवाह किए बिना अपनी धुन में मस्त रहते थे, इसलिए उन्हें मस्तमौला कहा गया है।
संत कबीरदास जी भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी (संतकाव्य) धारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं।
कबीर के अनुसार प्रेम प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपना शीश (अहंकार) समर्पित करना पड़ता है; स्वार्थ और घमंड को त्यागे बिना प्रेम की प्राप्ति संभव नहीं है।