१. किताबों की अब आदत बन गई है - नींद में चलने की।
२. किताबें जो रिश्ते सुनाती थीं - घर में वो कदरें अब नजर नहीं आतीं।
आधुनिक युग के सुप्रसिद्ध गीतकार गुलजार जी कंप्यूटर और इंटरनेट के युग में किताबों की उपेक्षा और उनकी मूक व्यथा का मार्मिक चित्रण करते हुए कहते हैं कि पुस्तकें मनुष्य की सबसे सच्ची और आत्मीय मित्र रही हैं। किंतु आज जब लोग अपना अधिकांश समय कंप्यूटर, मोबाइल और टीवी की स्क्रीन पर बिताते हैं, तो किताबें बंद अलमारियों के शीशों के पीछे कैद होकर रह गई हैं।
वे बड़ी उम्मीद और हसरत भरी नजरों से बाहर की ओर ताकती हैं कि शायद कोई उन्हें निकालेगा और पढ़ेगा। एक समय था जब मनुष्य की सुहानी शामें किताबों के संग बीता करती थीं, किंतु आज स्थिति यह हो गई है कि महीनों तक मनुष्य और किताबों का आमना-सामना तक नहीं होता। इस दूरी से किताबें अत्यंत उदास और एकाकी महसूस कर रही हैं।
| पूर्ण शब्द-युग्म | सार्थक वाक्य प्रयोग |
|---|---|
| घर-द्वार | पिता के डाँटने पर रमेश अपना घर-द्वार छोड़कर नौकरी की तलाश में शहर चला गया। |
| उधड़े-उधड़े | पुस्तकालय में उचित रख-रखाव न होने के कारण कई पुरानी पुस्तकों के पन्ने उधड़े-उधड़े थे। |
| भला-बुरा | बिना पूरी बात जाने किसी को भी भला-बुरा कहना समझदारी नहीं है। |
| प्रचार-प्रसार | आजकल हमारे विद्यालय में पर्यावरण सुरक्षा अभियान का प्रचार-प्रसार बहुत तेजी से चल रहा है। |
| भूख-प्यास | दिनभर की कठिन यात्रा और थकान के बाद मजदूर भूख-प्यास से व्याकुल हो गए। |
ग्रंथ और पुस्तकें मनुष्य की सच्ची मार्गदर्शक तथा ज्ञान की अक्षय स्रोत होती हैं। एक गुरु की भाँति पुस्तकें हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती हैं। वे बिना किसी स्वार्थ और भेदभाव के हर युग में मनुष्य का मार्गदर्शन करती आई हैं।
ग्रंथों में महापुरुषों, वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के जीवन का निचोड़ और अमूल्य अनुभव संचित होते हैं। जब भी मनुष्य संकट, निराशा या दुविधा में होता है, तो अच्छी पुस्तकें उसे सही मार्ग दिखाती हैं और उसमें नई ऊर्जा का संचार करती हैं। इसलिए कहा गया है कि पुस्तकें मनुष्य की सबसे सच्ची मित्र और आजीवन साथ निभाने वाली गुरु होती हैं।
महान शायर, फिल्मकार और गीतकार गुलजार द्वारा रचित 'किताबें' कविता आधुनिक युग में कंप्यूटर और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के कारण किताबों से बढ़ती दूरी और किताबों के मानवीय रिश्ते को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। कवि किताबों के स्पर्श-सुख, पन्ने पलटने के आनंद और उनके साथ जुड़े आत्मिक संबंधों को याद करते हैं।
कवि ने कंप्यूटर, इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण लोगों की पुस्तकों में घटती रुचि और किताबों के अकेलेपन की समस्या को रेखांकित किया है।
किताबों के पन्ने पलटते समय उँगलियों को थूक से गीला करने पर जीभ को जो स्वाद मिलता था, आज कंप्यूटर की स्क्रीन पर क्लिक करने से उस आनंद का लोप हो गया है।
इसका अर्थ है कि अब किताबें केवल सपनों में या विचारों में ही दिखाई देती हैं, वास्तविक जीवन में लोग उन्हें अलमारी से निकालकर कम ही पढ़ते हैं।