रुग्ण शय्या पर पड़ी माता जी को देखकर मोहन का धीरज तिल-तिल मिट रहा था।
| अशुद्ध वाक्य | शुद्ध वाक्य |
|---|---|
| १. लता कितनी मधुर गाती है। | लता कितना मधुर गाती है। |
| २. तितली के पास सुंदर पंख होते हैं। | तितली के सुंदर पंख होते हैं। |
| ३. उसने अपने घर गया। | वह अपने घर गया। |
| ४. पिताजी ने मुझे एक घड़ी दिया। | पिताजी ने मुझे एक घड़ी दी। |
| ५. हम हमारी पुस्तक पढ़ते हैं। | हम अपनी पुस्तक पढ़ते हैं। |
| ६. वे परस्पर में बात कर रहे थे। | वे परस्पर बातचीत कर रहे थे। |
"करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान।" संसार में परिश्रम ही सफलता की एकमात्र सच्ची कुंजी है। बिना कठोर परिश्रम के कोई भी व्यक्ति महानता अथवा सफलता के शिखर तक नहीं पहुँच सकता। केवल भाग्य या वरदान के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने वाले कभी जीवन में उन्नति नहीं कर पाते।
परिश्रम से बड़े-बड़े पर्वतों को काटकर मार्ग बनाए जा सकते हैं और असंभव को भी संभव में बदला जा सकता है। एक विद्यार्थी को ज्ञानार्जन के लिए, किसान को अन्न उगाने के लिए और वैज्ञानिक को आविष्कारों के लिए निरंतर पसीना बहाना पड़ता है। जो व्यक्ति स्वाभिमानपूर्वक परिश्रम करता है, वह कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता। अतः हमें स्वावलंबी बनकर अपने कर्म और परिश्रम पर विश्वास रखना चाहिए।
प्रगतिवादी काव्यधारा के ओजस्वी कवि डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' द्वारा रचित 'वरदान माँगूँगा नहीं' आत्मसम्मान, दृढ़ संकल्प और स्वाभिमान का अमर गीत है। कवि जीवन-पथ पर आने वाली चाहे कैसी भी विकट परिस्थितियाँ, असफलताएँ या संघर्ष हों, किसी के सामने झुकने या दया की भीख माँगने से साफ इंकार करते हैं। वे अपने कर्म, अपनी लघुता और स्वाभिमान को बनाए रखते हुए निरंतर संघर्षरत रहने का पावन संदेश देते हैं।
कवि एक स्वाभिमानी और कर्मठ व्यक्ति हैं; वे किसी की दया, अनुकंपा या एहसान के सहारे जीने के बजाय अपने स्वयं के परिश्रम और संघर्ष से आगे बढ़ना चाहते हैं।
कवि का मानना है कि असफलता या हार जीवन का अंत नहीं, बल्कि केवल एक अल्पविराम (विश्राम) है; जीवन निरंतर चलने वाला एक संग्राम है जिसमें लड़ते रहना ही धर्म है।
कवि ने सुखद स्मृतियों को प्रहरों (समय के क्षणों) और खंडहरों (बीते हुए अतीत) के लिए छोड़ दिया है; वे वर्तमान में जूझने के पक्षधर हैं।