| अभयारण्य का नाम | स्थान (जिला/क्षेत्र) | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|---|
| कर्नाला अभयारण्य | कर्नाला (पनवेल, रायगड) | विभिन्न प्रकार की प्रवासी तथा स्थानीय पक्षियों की प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध। |
| संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान | बोरीवली (मुंबई) | महानगर के बीच स्थित वन्यजीवों का केंद्र, बाघों व शेरों की सफारी एवं कान्हेरी गुफाएँ। |
| ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान | चंद्रपुर जिला | महाराष्ट्र का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान, बंगाल टाइगर (बाघों) के लिए विश्वप्रसिद्ध। |
| नागझिरा अभयारण्य | भंडारा व गोंदिया जिला | विविध वन्यजीव, पक्षी, चीतल, तेंदुए तथा प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध। |
| पेंच राष्ट्रीय उद्यान | नागपुर जिला | घने सागौन के वन तथा बाघ संरक्षण (प्रोजेक्ट टाइगर) परियोजना का प्रमुख क्षेत्र। |
रामरतन कुमार गुप्ता
राधा बंगला, कृष्ण नगर,
मुंबई: ४०० ०९८
दिनांक: १० मई, २०२४
सेवा में,
पर्यावरण विभाग अधिकारी,
महानगरपालिका,
मुंबई: ४०० ०३४
विषय : पक्षियों के लिए घोंसले तथा दाना-पानी की व्यवस्था करने हेतु प्रशंसा पत्र।
महोदय,
मैं रामरतन कुमार गुप्ता, कृष्ण नगर, मुंबई का निवासी हूँ। मैं इस पत्र के माध्यम से आपके विभाग की भूरि-भूरि प्रशंसा करना चाहता हूँ।
हाल ही में आपके विभाग के कर्मचारियों ने दादर चौक एवं आसपास के प्रमुख वृक्षों पर पक्षियों के रहने के लिए कृत्रिम घोंसले और भीषण गरमी से राहत दिलाने के लिए चुग्गा, दाना और स्वच्छ शीतल जल के पात्रों की उत्तम व्यवस्था की है। यह कार्य अत्यंत सराहनीय और परोपकारी है।
भीषण गरमी के इन दिनों में प्राकृतिक जलस्रोतों के सूख जाने के कारण अनेक मूक पक्षी प्यास और धूप से तड़पकर अपने प्राण गँवा देते हैं। आपके विभाग की इस त्वरित और संवेदनशील पहल ने सैकड़ों पक्षियों को जीवनदान दिया है। पक्षियों के प्रति दयाभाव रखने की अनुपम प्रेरणा आपके विभाग द्वारा समाज को मिल रही है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके विभाग के इस पुनीत कार्य से प्रेरणा लेकर अन्य सामाजिक संस्थाएँ भी पशु-पक्षियों के संरक्षण हेतु आगे आएँगी। हमारे समूचे इलाके के नागरिक आपके इस संवेदनशील कार्य की सराहना कर रहे हैं। आपके विभाग के सभी कर्मचारी हार्दिक धन्यवाद और साधुवाद के पात्र हैं।
सधन्यवाद!
भवदीय,
रामरतन कुमार गुप्ता
अलकापुरी गाँव चारों ओर से हरे-भरे खेतों से घिरा एक सुंदर व संपन्न गाँव था। गाँव के सभी किसान अत्यंत परिश्रमी और ईमानदार थे। दिन-रात खेतों में पसीना बहाकर वे अच्छी फसलें उगाते थे और परस्पर प्रेमभाव से रहते थे।
किंतु समय कभी एक-सा नहीं रहता। सुख और दुख तो जीवन के दो पहिए हैं। अलकापुरी गाँव पर पिछले तीन वर्षों से वर्षा की एक बूँद भी नहीं गिरी। बादल आते और बिना बरसे ही चले जाते। देखते-ही-देखते समूचा गाँव भीषण अकाल की चपेट में आ गया। खेतों की मिट्टी सूखकर चटक गई और अन्न का एक दाना भी नहीं उपजा।
गाँव के मध्य एक विशाल तालाब था, जो गाँववासियों और पशु-पक्षियों की प्यास बुझाता था। किंतु तीन वर्षों के भीषण सूखे में वह गहरा तालाब भी सूखकर पूरी तरह खाली हो गया। अब तो लोगों के सामने पीने के पानी और भोजन के लाले पड़ गए। विवश होकर ग्रामीण अपने बाल-बच्चों के साथ गाँव छोड़कर अन्य नगर की ओर पलायन करने लगे।
जब वे गाँव की सीमा पर पहुँचे, तभी सामने से एक तेजस्वी साधु महात्मा आते दिखाई दिए। उनके शांत मुखमंडल पर अद्भुत तेज था। ग्रामीणों ने साधु महाराज के चरण स्पर्श किए और रोते हुए अपने गाँव के अकाल और पानी के संकट की व्यथा सुनाई।
साधु ने कुछ क्षण ध्यान लगाया और पूछा, "इस गाँव का सबसे धनी जमींदार कहाँ है?" एक किसान ने कहा, "महाराज, जमींदार के पास गोदामों में हजारों मन अनाज और धन है। वे अपने लिए दूर से पानी मँगवा लेते हैं, इसलिए वे गाँव में ही हैं।" साधु ग्रामीणों को साथ लेकर जमींदार की हवेली पहुँचे। साधु के दिव्य तेज के समक्ष जमींदार नतमस्तक हो गया।
साधु ने अत्यंत मृदु किंतु प्रभावशाली वाणी में कहा, "हे जमींदार! धन और संपत्ति की सार्थकता विपत्ति में असहायों के काम आने में है। मानवता ही संसार का सबसे बड़ा धर्म है। यदि तुम संकट की इस घड़ी में जनसहायता करोगे, तो ईश्वर की कृपा अवश्य होगी।" जमींदार की आँखें खुल गईं और उसे अपने स्वार्थ का गहरा पश्चाताप हुआ।
उसने तत्काल अपनी हवेली और गोदामों के ताले खोल दिए और सारा अनाज व आवश्यक सामग्री भूखे ग्रामीणों में बाँट दी। इस जनसहायता का यह शुभ परिणाम निकला कि गाँववासियों की दुआएँ रंग लाईं और उसी शाम आकाश में घने मेघ घिर आए तथा मूसलाधार वर्षा प्रारंभ हो गई। सूखा तालाब पुनः लबालब भर गया और गाँव का अकाल समाप्त हुआ।
प्राचीन काल से ही वन और जंगल मानव जीवन तथा पर्यावरण के लिए प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार रहे हैं। जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के विशाल फेफड़े (Green Lungs) हैं। जिस प्रकार मनुष्य जीवित रहने के लिए श्वसन क्रिया में ऑक्सीजन ग्रहण करता है और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है, उसी प्रकार वृक्ष प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर प्रचुर मात्रा में जीवनदायिनी ऑक्सीजन वायुमंडल में छोड़ते हैं।
पीपल, बरगद, नीम, तुलसी और शमी जैसे वृक्ष अत्यधिक मात्रा में ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं। यदि जंगल न हों, तो वायुमंडल में विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाएगा, तापमान में वृद्धि होगी और पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी असंभव हो जाएगी। अतः शुद्ध वायु और स्वस्थ जीवन के लिए जंगलों की कटाई रोककर अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
पालतू प्राणी मूक और निश्छल होते हैं। वे मनुष्य से केवल प्रेम, स्नेह और अपनेपन की आशा रखते हैं। मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह अपने पालतू पशु-पक्षियों के प्रति क्रूरता न बरते, बल्कि उनकी उचित देखभाल करे। उनके लिए समय पर पौष्टिक भोजन, स्वच्छ जल और सुरक्षित, हवादार आवास की व्यवस्था करनी चाहिए।
प्रस्तुत पाठ 'जंगल' में लेखिका चित्रा मुद्गल जी ने यह संदेश दिया है कि कई बार शौक में पाले गए वन्यजीव अपने प्राकृतिक परिवेश और माता-पिता से बिछड़कर मानसिक तनाव व अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैं। अतः हमें पशुओं की स्वतंत्रता का भी सम्मान करना चाहिए और उन्हें पीड़ा पहुँचाने से बचना चाहिए।
सुप्रसिद्ध आधुनिक साहित्यकारा चित्रा मुद्गल द्वारा रचित 'जंगल' एक हृदयस्पर्शी संवादात्मक कहानी (पूरक पठन) है। इस पाठ में बालमन की कोमलता, बालसुलभ संवेदनशीलता और पशु-पक्षियों के प्रति सहज आत्मीयता का सुंदर अंकन किया गया है। बालक पीयूष के माध्यम से लेखिका यह उजागर करती हैं कि जानवर भी भावनाओं से युक्त होते हैं और उनका सच्चा घर प्राकृतिक जंगल ही है।
पीयूष के घर में पाले गए दो जुड़वाँ खरगोशों के नाम 'सोनू' और 'मोनू' थे।
पीयूष की माँ द्वारा फर्श पर असावधानीवश गिरी डाबर की पारे की गोली खा लेने से विषाक्तता के कारण सोनू की मृत्यु हो गई थी।
पीयूष ने यह दृढ़ संकल्प लिया कि वह अब से किसी भी मूक प्राणी को पिंजरे या घर में बंद करके नहीं पालेगा, बल्कि उन्हें उनके प्राकृतिक घर (जंगल) में स्वतंत्र रहने देगा।