कला और मानव जीवन का संबंध अत्यंत प्राचीन व गहरा है। कला मनुष्य की अंतरात्मा की सुंदर अभिव्यक्ति और उसकी रचनात्मकता का दर्पण है। जब कोई व्यक्ति चित्रकला, शास्त्रीय संगीत, साहित्य, नृत्य या मूर्तिकला जैसी किसी विधा में रुचि लेता है, तो उसका मन सांसारिक चिंताओं, तनाव और क्लेशों से मुक्त हो जाता है। कला अंतःकरण को शांति और अवर्णनीय आनंद प्रदान करती है।
'अपराजेय' पाठ में अमरनाथ का जीवन इस तथ्य का सजीव प्रमाण है। एक भीषण कार दुर्घटना में अपनी टाँग खो देने के पश्चात वे निराश होने के स्थान पर चित्रकला और संगीत की साधना में लीन हो गए। रंगों और सुरों की दुनिया ने उनके शारीरिक दर्द को भुलाकर उनके जीवन को उमंग और उल्लास से भर दिया। अतः यह पूर्णतः सत्य है कि कला में अभिरुचि होने से जीवन की सार्थकता और उसका आनंद कई गुना बढ़ जाता है।
| वाक्य | निहित भाव |
|---|---|
| 'टाँग ही तो काटनी है, तो काट दो।' | हास्य व सहज भाव, निडरता, सकारात्मकता, दृढ़ निश्चय |
| 'मैं जानता हूँ कि जीवन का विकास पुरुषार्थ में है, आत्महीनता में नहीं।' | शांत भाव, संघर्षशीलता, आत्मगौरव, अटूट जिजीविषा |
जीवन सुख और दुख, अनुकूलता और प्रतिकूलता का एक निरंतर प्रवाह है। मनुष्य के जीवन में परिस्थितियाँ कभी पहले से बताकर नहीं आतीं। कई बार अप्रत्याशित संकट अथवा भीषण दुर्घटनाएँ जीवन की दिशा बदल देती हैं। ऐसे समय में जो व्यक्ति परिस्थितियों के सम्मुख घुटने टेक देता है या रोने-धोने में समय नष्ट करता है, वह जीते जी पराजित हो जाता है।
इसके विपरीत, जो धीर पुरुष अपनी वर्तमान स्थिति को बिना किसी शिकायत के सहर्ष स्वीकार करता है और अपने बचे हुए सामर्थ्य से नए सिरे से संघर्ष आरंभ करता है, वही वास्तविक विजेता बनता है। अमरनाथ ने एक-एक कर अपने अंग खो दिए, किंतु अपनी जिजीविषा और पुरुषार्थ को कभी नहीं खोया। संकट को चुनौती मानकर आगे बढ़ना ही सच्चा जीवन है और इसी में मानव जीवन की सर्वोच्च सार्थकता है।
'अपराजेय' आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कहानीकार कमल कुमार द्वारा रचित एक अत्यंत प्रेरणादायी और मानवीय जिजीविषा को उजागर करने वाली वर्णनात्मक कहानी है। इस कहानी के केंद्रीय पात्र अमरनाथ एक भीषण कार दुर्घटना में अपनी एक टाँग, दायाँ हाथ और अंततः अपनी वाणी खो देते हैं, किंतु वे जीवन के प्रति कभी निराश नहीं होते। चित्रकला, शास्त्रीय संगीत और प्रकृति की सूक्ष्म ध्वनियों में वे जीवन का अलौकिक आनंद खोजते हैं और परिस्थितियों के सम्मुख कभी पराजित न होकर 'अपराजेय' सिद्ध होते हैं।
क्योंकि एक भीषण दुर्घटना में एक-एक कर अपने शरीर के महत्वपूर्ण अंग (टाँग, हाथ, वाणी) खोने के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और न ही कभी ईश्वर अथवा भाग्य को कोसा। वे हर स्थिति में मुस्कुराते हुए जीवन जीते रहे।
टाँग कटने के बाद अमरनाथ ने स्वचालित व्हीलचेयर पर बैठकर कैनवास, रंग और तूलिका मँगवाई और प्रकृति के सुंदर दृश्यों की चित्रकारी में लीन हो गए।
दायाँ हाथ कट जाने के पश्चात अमरनाथ ने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा और साधना आरंभ की और प्रातः एवं सायं संगीत का रियाज करने लगे।