| अ. क्र. | नदी का नाम | उद्गम स्थल | राज्य | प्रमुख बाँध का नाम |
|---|---|---|---|---|
| १. | गंगा नदी | गंगोत्री (गोमुख) | उत्तराखंड | टिहरी बाँध / फरक्का बाँध |
| २. | यमुना नदी | यमुनोत्री हिमानी | उत्तराखंड | ओखला बाँध / लखवाड़ बाँध |
| ३. | कोयना नदी | महाबलेश्वर | महाराष्ट्र | कोयना बाँध (शिवाजी सागर) |
| ४. | गोदावरी नदी | त्र्यंबकेश्वर (नासिक) | महाराष्ट्र | जायकवाड़ी बाँध (पैठण) |
| ५. | नर्मदा नदी | अमरकंटक | मध्य प्रदेश | सरदार सरोवर बाँध |
| शब्द | अर्थ १ एवं वाक्य | अर्थ २ एवं वाक्य |
|---|---|---|
| कुल | वंश : राम सूर्यकुल के गौरव थे। | किनारा (तट) : नदी के कुल पर साधु तपस्या कर रहे थे। |
| वार | दिन : आज सोमवार का दिन है। | प्रहार (आक्रमण) : सैनिक ने शत्रु के वार को ढाल पर रोक लिया। |
| पद | चरण (पैर) : भक्त ने प्रभु के पद छुए। | ओहदा (दर्जा) : उन्होंने प्रधानाचार्य का पद ग्रहण किया। |
| जल | पानी : जल ही जीवन का मूल आधार है। | जलना (अग्नि में) : धूप में घास जल गई। |
| उत्तर | दिशा : हिमालय भारत के उत्तर में है। | जवाब : छात्र ने प्रश्न का सही उत्तर दिया। |
१. 'जिसे वहाँ से जबरन हटाना पड़ता था।'
• प्रेरणार्थक क्रिया रूप : हटाना (प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया - मूल धातु 'हटना')
• वाक्य प्रयोग : प्रशासन ने सड़क चौड़ी करने के लिए अतिक्रमण को तुरंत हटाया।
२. 'महाराज उम्मेद सिंह द्वारा निर्मित होने से 'उम्मेद भवन' कहलवाया जाता है।'
• प्रेरणार्थक क्रिया रूप : कहलवाया (द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया - मूल धातु 'कहना')
• वाक्य प्रयोग : अपनी ईमानदारी के कारण ही वह समूचे गाँव में 'सज्जन पुरुष' कहलवाया जाता है।
| सहायक क्रिया | स्वतंत्र वाक्य प्रयोग |
|---|---|
| होना | पहाड़ी के ऊपर एक प्राचीन मंदिर स्थित है। |
| पड़ना | अचानक ठोकर लगने से वह जमीन पर गिर पड़ा। |
| रहना | परिश्रमी विद्यार्थी निरंतर स्वाध्याय करता रहता है। |
| करना | स्वास्थ्य रक्षा के लिए तुम नित्य सुबह व्यायाम किया करो। |
१. प्रथम पद्यांश भावार्थ :
कवि अशोक चक्रधर जी के अनुसार, सिंधु नदी का पावन जल मनुष्य से संवाद करते हुए कहता है कि मैं अनादि काल से निरंतर गतिशील और प्रवाहमान हूँ। मुझमें गतिशीलता के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं की हलचल है और मेरी लहरों में कल-कल की मीठी ध्वनि गूँजती है। विश्व की प्राचीनतम सिंधु घाटी सभ्यता मेरे ही तटों पर पुष्पित और पल्लवित हुई है; इसलिए मैं मानव संस्कृति और सभ्यता का प्रथम उद्गम स्थल (आदि बिंदु) हूँ।
२. द्वितीय पद्यांश भावार्थ (मानवता व सर्वधर्म समभाव) :
सिंधु का जल बिना किसी पक्षपात के प्राणीमात्र का कल्याण करता है। मेरे शीतल जल में स्नान करने या प्यास बुझाने आने वाले किसी भी व्यक्ति से मैं उसकी जाति, मजहब, प्रांत अथवा धर्म नहीं पूछता। मेरे लिए न कोई मित्र है और न शत्रु। मैं तो घायल सैनिकों के घाव धोने और रोती हुई विधवा के आँसू पोंछने वाला संवेदनशील जल हूँ। मनुष्य को भी नदी के जल की भाँति संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सर्वधर्म समभाव और विश्वबंधुत्व को अपनाना चाहिए।
'सिंधु का जल' आधुनिक हिंदी कविता की एक उत्कृष्ट रचना है, जिसमें कवि अशोक चक्रधर ने सिंधु नदी के जल को मानवीय संवेदनाओं के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया है। नदी का पावन जल हमें परोपकार, समरसता, विश्वशांति और सर्वधर्म समभाव का पावन संदेश देता है। यह कविता संकीर्ण धार्मिक, जातीय और प्रांतीय दीवारों को तोड़कर मानवता के पथ पर चलने की प्रेरणा देती है।
क्योंकि विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में से एक 'सिंधु घाटी सभ्यता' का जन्म और विकास सिंधु नदी के तटों पर ही हुआ था।
सिंधु का जल मनुष्य को जाति-धर्म और द्वेषभाव से परे होकर केवल मानवता, बंधुत्व और परोपकार को अपनाने की सीख देता है।
मुख्य क्रिया के साथ जुड़कर उसके अर्थ को पूर्ण और स्पष्ट करने में सहायता करने वाली क्रिया को 'सहायक क्रिया' कहा जाता है (जैसे: गिर पड़ा, कहने लगे)।