प्रस्तुत कविता के माध्यम से छायावाद के मूर्धन्य कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने मनुष्य को प्रकृति से आत्मीय नाता जोड़ने और प्रकृति के अनुपम सौंदर्य से जीवन जीने की प्रेरणा लेने का पावन संदेश दिया है। प्रकृति के कण-कण (घास, पर्वत, झरने, फूल, तितलियाँ) में असीम उल्लास, निस्वार्थ परोपकार और शांति भरी हुई है।
कवि संदेश देते हैं कि मनुष्य को ईर्ष्या, द्वेष, लोभ और क्षुद्र अहंकार की दीवारों को तोड़कर प्रकृति की तरह उदार और विशाल हृदय वाला बनना चाहिए। जब तक मानव विश्व-चेतना और प्रकृति के साथ एकाकार नहीं होगा, तब तक उसके जीवन का दुख और संताप दूर नहीं हो सकता।
पर्वतीय अंचल पर बिखरी हुई अप्रतिम प्राकृतिक सुषमा का आनंद लेते हुए कवि के मन में सहसा एक विचार कौंधता है कि जब जड़ प्रकृति में इतना अद्भुत सौंदर्य, उल्लास और जीवन-रस भरा पड़ा है, तो फिर इस चेतन मानव के जीवन में इतनी विषण्णता, दुख और निराशा क्यों छाई हुई है?
कवि कहते हैं कि मनुष्य तो ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि है, फिर भी उसका जीवन अभिशापित क्यों प्रतीत होता है? इसका मूल कारण यह है कि मनुष्य ने अपने भीतर 'क्षुद्र अहंकार' को पाल रखा है। वह अपने स्वार्थ की संकीर्ण सीमा में सिमटकर समग्र विश्व-चेतना और प्रकृति के आनंद से विलग हो गया है। अतः मानव को अपने आंतरिक स्वभाव का पुनर्मूल्यांकन कर प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करना चाहिए।
| क्र. | अशुद्ध रूप (अनुपयुक्त शब्द सहित) | हटाया गया शब्द | शुद्ध रूप (सही मुहावरा/कहावत) |
|---|---|---|---|
| १. | टोपी पहनना | पहनना | टोपी पहनाना (मूर्ख बनाना/धोखा देना) |
| २. | कमर बंद करना | कमर | नजर बंद करना (हिरासत में रखना) |
| ३. | गेहूँ गीला होना | गेहूँ | आटा गीला होना (कठिनाई में पड़ना) |
| ४. | नाक की किरकिरी होना | नाक | आँख की किरकिरी होना (अप्रिय लगना) |
| ५. | धरती सर पर उठाना | धरती | आसमान सर पर उठाना (बहुत शोर मचाना) |
| ६. | लाठी पानी का बैर | लाठी | आग-पानी का बैर (स्वाभाविक शत्रुता होना) |
'निसर्ग वैभव' छायावादी काव्यधारा के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित एक अत्यंत मनोरम प्राकृतिक कविता (पूरक पठन) है। इस कविता में अल्मोड़ा और कौसानी के पर्वतीय अंचल की प्राकृतिक सुषमा, उषा, संध्या, रात का आकाश, वृक्ष, फूल और पक्षियों के कलरव का सजीव चित्रण किया गया है। कवि प्रकृति के माध्यम से मनुष्य को अपने अहंकार से मुक्त होकर विश्व-चेतना से जुड़ने का आध्यात्मिक संदेश देते हैं।
पंत जी को हिंदी साहित्य में 'प्रकृति के सुकुमार कवि' तथा छायावाद के प्रमुख चार स्तंभों में से एक के रूप में जाना जाता है।
'मरकत' का अर्थ पन्ना (हरा रत्न) होता है। हरी-भरी मखमली घास से आच्छादित धरती को कवि ने पन्ने के रत्नजड़ित आँगन की उपमा दी है।
इसका अर्थ दो ऐसी वस्तुओं या व्यक्तियों के बीच स्वाभाविक एवं जन्मजात विरोध या शत्रुता होना है, जिनका आपस में मेल असंभव हो।